उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर. . .

Kite

एक कटी पतंग की जैसी डोर
उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर
कभी ऊँचे पेड़ो से तकराकर लहराते
तो कभी हवा के तेज़ झोकों से आज़ाद हो जाते

हैं सफ़र यह निरंथर, न रुखेगी कभी
जो मिली कुशी, तो लगे जिंदगी
और कही मिले निराशी, तो लगे बंदगी
लो बन के अरमान, हम उड़ चले

चार अक्षर ही लिखे ते नए पन्ने पर
फिर आया बुलावा – एक आवाज़ ऐसी
न चेहरा ता और न थी कोई दिलचस्पी
जब समज आया की बहुत देर हो चुकी

लो फिर निकल लिए हम बोरिया भांद कर
नए राहें और नए मंजिलों के खोज पर
एक कटी पतंग की जैसी डोर
उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर…

6 thoughts on “उड़ रहे हैं हम जाने किस ओर. . .”

  1. bahut badiya Vinni ji, saanathe ke baad bhi app ki awaz atti, patang kahi aur door kahi aur jatti, isse andaz ke kaaran app humein bhaati hai….. i am still confused with the 3rd para……

    Regards,
    Nikholic

  2. Nikholic
    thank u!
    third para mein, i am trying to say that i had just found a little comfort zone n got anchored, when u came n called me away…i wanted to see who u r, but i lost interest when i realised it was too late….i have to keep floating…
    hope ur not confused anymore:)

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